अयोध्या विवाद को लेकर जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष व मामले में पक्षकार मौलाना सैय्यद अरशद मदनी ने कहा कि अगर कोई विवाद बातचीत और आपसी समझौते से हल हो जाए तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता, लेकिन बातचीत या समझौता आस्था के आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्यस्थता पैनल को और समय दिए जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मौलाना अरशद मदनी ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व की टिप्पणी का हवाला देते हुए कहा कि अदालत शुरू में ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि यह आस्था का नहीं बल्कि मिल्कियत (स्वामित्व) का मामला है।
मौलाना मदनी ने कहा कि क्योंकि मध्यस्थता पैनल ने बंद लिफाफे में गोपनीय रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल की है जिस पर चीफ जस्टिस ने कमेटी को और 13 दिन की मोहलत दी है। इसलिए हमें अंतिम रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दो अगस्त को मामले की अहम सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी। जिसमें यह फैसला हो जाएगा कि समझौता हुआ या नहीं। उसके बाद अदालत अंतिम बहस के लिए आदेश जारी कर सकती है।
उन्होंने कहा कि जमीयत के वकील समझौता प्रक्रिया से पहले भी अपनी बहस के लिए तैयार थे और आज भी तैयार हैं। मौलाना अरशद मदनी ने यह भी कहा कि छह दिसंबर 1992 को एक ऐतिहासिक मस्जिद को दिनदहाड़े केंद्र और राज्य सरकार के सामने शहीद करके मलबे का ढेर बना दिया गया। इससे देश के उन करोड़ों लोगों का विश्वास आहत हुआ जो न्यायप्रिय हैं और देश के संविधान व लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं। इसलिए अब न्याय के द्वारा ही उनके टूटे हुए भरोसे को बहाल किया जा सकता है। उन्होंने जोर दिया कि हम तथ्यों के आधार पर इस मामले में फैसला चाहते हैं आस्था के आधार पर नहीं।